देहरादून। उत्तराखंड में एक बार फिर सरकारी भर्ती प्रक्रिया विवादों के घेरे में है। इस बार मामला सहायक अध्यापक (एल.टी.) भर्ती-2024 (1544 पद) का है, जिसमें अभ्यर्थियों का आरोप है कि उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) ने माननीय उत्तराखंड हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों की भावना के अनुरूप संशोधित परिणाम जारी नहीं किया। इसके विरोध में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी आयोग कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए हैं और चेतावनी दी है कि यदि न्याय नहीं मिला तो राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
यह विवाद केवल एक भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की भर्ती व्यवस्थाओं पर लगातार उठते सवालों और युवाओं के घटते भरोसे का भी प्रतीक बनता जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
सहायक अध्यापक (एल.टी.) भर्ती-2024 के तहत 1544 पदों पर भर्ती प्रक्रिया चल रही थी। भर्ती परिणाम जारी होने के बाद कुछ अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया को चुनौती देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
अभ्यर्थियों के अनुसार, 4 जून 2025 को हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि:
9 फरवरी 2025 को चयनित 1347 अभ्यर्थियों का चयन यथावत रहेगा।
सामान्य अध्ययन के दो प्रश्न हटाए जाने के कारण सभी अभ्यर्थियों को उसके अनुरूप अतिरिक्त अंक देकर संशोधित परिणाम घोषित किया जाए।
संशोधित मेरिट तैयार करते समय प्रत्येक विषय एवं श्रेणी में 09-02-2025 के परिणाम के अंतिम चयनित अभ्यर्थी (Last Selected Candidate) के प्राप्तांक को कट-ऑफ का आधार माना जाए।
बाद में विशेष अपील दायर हुई, जिसे भी वापस लेने के बाद आयोग ने संशोधित परिणाम जारी करने का आश्वासन दिया।
अभ्यर्थियों का आरोप: आयोग ने कोर्ट की भावना के विपरीत परिणाम जारी किया
धरने पर बैठे अभ्यर्थियों का आरोप है कि आयोग ने 24 जुलाई 2026 को जो संशोधित परिणाम जारी किया, वह हाईकोर्ट के आदेशों की भावना के अनुरूप नहीं था।
अभ्यर्थियों द्वारा साझा किए गए पत्र में मुख्य आरोप यह है कि:
हाईकोर्ट ने पुराने अंतिम चयनित अभ्यर्थी के अंकों को ही कट-ऑफ का आधार बनाने की बात कही थी।
लेकिन संशोधित परिणाम में नया कट-ऑफ लागू कर दिया गया।
इससे कई ऐसे अभ्यर्थी, जो न्यायालय के आदेश के अनुसार चयनित होने चाहिए थे, सूची से बाहर हो गए।
अनेक मेरिटधारी एवं पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति से वंचित कर दिया गया।
संलग्न पत्र में अभ्यर्थियों ने सरकार से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा हाईकोर्ट के आदेशों के अनुरूप संशोधित परिणाम जारी किया जाए।
UKSSSC कार्यालय के बाहर धरना
संशोधित परिणाम से असंतुष्ट अभ्यर्थी UKSSSC कार्यालय के बाहर लगातार धरना दे रहे हैं।
उनकी प्रमुख मांगें हैं:
हाईकोर्ट के आदेशों का पूर्ण पालन।
संशोधित मेरिट का पुनर्मूल्यांकन।
पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति।
भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता।
अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो पूरे प्रदेश में बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
उत्तराखंड की भर्ती परीक्षाएं: विवादों का लंबा इतिहास
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में कई भर्तियां विवादों में रही हैं। कभी पेपर लीक, कभी नकल माफिया, तो कभी अदालतों में लंबी सुनवाई के कारण हजारों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ है।
प्रमुख उदाहरण:
स्नातक स्तरीय भर्ती पेपर लीक
सचिवालय रक्षक भर्ती विवाद
वन आरक्षी भर्ती
पटवारी-लेखपाल परीक्षा
VDO भर्ती
JE भर्ती
पुलिस भर्ती से जुड़े विवाद
विभिन्न विभागों की भर्तियां जो लंबे समय तक न्यायालय में लंबित रहीं।
इन घटनाओं ने राज्य की भर्ती प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
युवाओं का टूटता विश्वास
एक अभ्यर्थी कई वर्षों तक तैयारी करता है।
लाखों रुपये कोचिंग पर खर्च होते हैं।
परिवार आर्थिक और मानसिक दबाव झेलता है।
परीक्षा होती है।
परिणाम आता है।
फिर कोर्ट।
फिर संशोधित परिणाम।
फिर नई मेरिट।
फिर नई याचिकाएं।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान मेहनत करने वाले युवाओं का होता है।
सरकार और आयोग से अपेक्षा
यदि किसी मामले में न्यायालय स्पष्ट निर्देश देता है तो सरकारी संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे उन निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करें। यदि किसी पक्ष को आदेश की व्याख्या पर आपत्ति हो, तो उसका समाधान न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।
अभ्यर्थियों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी चयनित अभ्यर्थी का नुकसान करना नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों के अनुरूप पात्र अभ्यर्थियों को भी उनका अधिकार दिलाना है।
आगे क्या हो सकता है?
यदि विवाद का समाधान नहीं हुआ तो संभावित स्थिति:
पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
सरकार से हस्तक्षेप की मांग बढ़ सकती है।
राज्यव्यापी आंदोलन हो सकता है।
भर्ती प्रक्रिया फिर कानूनी विवादों में उलझ सकती है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड के युवा केवल एक मांग कर रहे हैं—निष्पक्ष भर्ती और समय पर न्याय।
सहायक अध्यापक (एल.टी.) भर्ती-2024 का विवाद अब केवल एक परिणाम का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। धरने पर बैठे अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि हाईकोर्ट के आदेशों का सही पालन नहीं हुआ, तो योग्य उम्मीदवारों के साथ न्याय नहीं होगा।
अब सबकी निगाहें राज्य सरकार, UKSSSC और आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं कि इस विवाद का समाधान किस प्रकार होता है और क्या अभ्यर्थियों की मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाता है।
नोट: यह लेख अभ्यर्थियों द्वारा लगाए गए आरोपों, उनके धरने, तथा साझा किए गए पत्र के आधार पर तैयार किया गया है। आयोग या सरकार का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी समान महत्व के साथ प्रकाशित किया जाना चाहिए।
अगर आपको लगता है कि उत्तराखंड सरकार बच्चों के साथ न्याय संगत कार्य नहीं कर रही है तो आवाज बुलंद करो ओर आप इस पोस्ट को शेयर भी कर उनकी आंखे खोलने कम करें।








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